गैंग्स ऑफ़ वासेपुर : एक ऑथेंटिक कथा

शुरुआत एक पाप-स्वीकारोक्ति और अनुराग कश्यप से क्षमा याचना के साथ शुरू करना चाहूँगा . पाप ये है की मैंने उनकी फिल्म गैंग्स  ऑफ़ वासेपुर इन्टरनेट पर देखी और कारण ये है की मई जहा हु उनकी फिल्म कभी रिलीज़ नहीं होगी और मुझ बिहारी के लिए संभव नहीं है की वो लम्बे समय तक उनके इस 'मुस्लिम महाभारत' को ना देखे रह सके।






     
हमारे समय में बहुत सारी  फिल्मे है हिंदी में पर 'ऑथेंटिक' फिल्मे बहुत ही कम देखने को मिलाती ही। हिंदी सिनेमा के 100 सालो के इतिहास में 'ऑथेंटिक' फिल्मो को आप उंगली में गिन सकते है। ऑथेंटिक से मेरा मतलब है आप का जो बिषय है आपका जो उद्देश्य है फिल्म को बनाने का आप उस बिषय या उद्देश्य को बीना की मिर्च मसाला लगाए लोगो को बोलते है। इसके पहले मै बिशाल भारद्वाज की ओमकारा देखि थी फिल्म बहुत ही अच्छी थी पर मै   उसको ऑथेंटिक नहीं कह सकता क्योकि बिशाल भारद्वाज का संगीत बहुत अच्छा होने के बावजूद उस समाज को कतई नहीं दर्शाता जिसके बारे में वो कहानी है। ओमकारा में बहुत सारे अच्छे कलाकार और उनके अच्छे अभिनय करने के बावजूद वो उस भाषा को कतई नहीं बोलते जिस जगह को लेकर वो फिल्म बनाई गयी थी। पर अनुराग कश्यप के गैंग्स  ऑफ़ वासेपुर के लोग वही बोलते है और  वही गाते है जो बास्तव में वासेपुर के लोग करते है। और यही कारण है की आप अगर इन्टरनेट पर देखे तो गैंग्स  ऑफ़ वासेपुर के संगीत समीक्षा को पढ़े तो समीक्षक गैंग्स  ऑफ़ वासेपुर के संगीत को औसत से भी कम मानते है। समस्या संगीत में नही है समीक्षक में है जो बास्तव में वासेपुर से जुड़ ही नहीं पाता . वो स्वीकार ही नहीं कर पाता  के रहमान के 'इलेक्ट्रिक गिटार ' के अलावा भी कुछ ऐसी चीज़े है जहा संगीत बसता है। और यही कारण है की जब कैलाश खेर एक गिटार के सहारे 'अलाल्ह के बन्दे ' गाते है तो सब लोग वाह वाह करते है पर जब दीपक कुमार मुजफ्फरपुर वाले ने 'हमनी के छोड़ ' गाना सिर्फ एक हारमोनियम पर गाया तो किसी संगीत समीक्षक का ध्यान ही नहीं गया। 
    अब थोडा फिल्म के बारे में बात कर ले। मेरी देखी ये शायद यहाँ पहली फिल्म होगी जहा पर सिर्फ एक किरदार ही सब कुछ है। बिस्वास करिए सरदार खान ही  गैंग्स  ऑफ़ वासेपुर का नायक है..नायीका है..बिलेन है। उसके अलावा जो भी लोग है बस सरदार के लिए है। उनका उतना ही योगदान है इस महाभारत में जितना योगदान पुराने महाभारत में दुशाशन का पुराने महाभारत में है. कहानी की समस्या है की वो वास्सेपुर के बारे में सबकुछ दिखा बता देना चाहती है और यही कारण है की फिल्म कही कही घिसटती नज़र आती है पर जब टाइम-फ्रेम बहुत बड़ा हो तो ऐसा होना स्वाभाविक है। सबसे अच्छी बात, जो की मै  पहले भी बता चुका हु, जो मुखे लगी वो है इसकी authenaticity . आप फिल्म के उस दृश्य के बारे में सोचे जिसमे मुकेश तिवारी 'सलाम इ इश्क मेरी जान ' गा रहे होते है। जैसे उन्होंने 'र ' के बदले 'ण' का प्रयोग किया है उससे मुझे मेरे धनबाद के दोस्तों की याद आ गयी जिनको हम ऐसे ही चिढ़ाया करते थे  'र ' के बदले 'ण' का प्रयोग करके। हलकी मनोज बाजपेयी की फिल्म शूल भी बिहारी परिद्रश्य में ही थी पर अगर आप देखे तो आप जान जायेंगे की लोगो ने शूल में कितना मसाला मिलाया था। 
  अंत में अनुराग को धन्यबाद की गुलाल और उड़ान के बाद  उन्होंने गैंग्स  ऑफ़ वासेपुर के रूप में फिर से कुछ देखने लायक कुछ दिया है. 

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